आज भारत में एक कानून चर्चा में है
जिसका नाम है UGC [ University Grants Commission] आज इस कानून को ST,SC,OBC समुदाय के लोग समर्थन कर रहे वहीं सामान्य वर्ग (GENERAL CATEGORY) के लोग इस कानून का जौरों से विरोध कर रहे हैं
हालांकि अभी के लिए इस कानून के नये नियमों पर 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए Equity Regulations (2026) पर अस्थायी रोक लगा दी, क्योंकि अदालत ने इन नियमों को अस्पष्ट (vague) और दुरुपयोग की आशंका वाला मानते हुए फिलहाल लागू करने से रोक दिया।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि इस कानून के बारे ज्यादातर आदिवासी समुदाय के विद्यार्थियों को जानकारी नहीं है ओर सबसे ज़्यादा ज़रूरत भी आदिवासी समुदाय को है इस कानून की क्योंकि इतने समय तक शिक्षा से दूर रहा है आदिवासी समुदाय और आज जब वो शिक्षा में आगे बढ़ रहें तब उनको जातिगत अपमान का सामना करना पड़ रहा है इस देश के मुल मालिक होने के बावजूद ये हालात हैं आज आदिवासी समुदाय की
ऐसा ही एक मामला 2019 में सामने आया था जो उस समय पुरे देश में चर्चचा में था
पायल तडवी, महाराष्ट्र की आदिवासी (ST) समुदाय की MBBS छात्रा थीं, जो मुंबई के BYL नायर मेडिकल कॉलेज में पढ़ती थीं।
उन्होंने हॉस्टल में आत्महत्या कर ली। आरोप लगा कि उन्हें सीनियर डॉक्टरों द्वारा लगातार जातिगत अपमान, मानसिक उत्पीड़न और भेदभाव झेलना पड़ा।
इस मामले में तीन सीनियर डॉक्टरों पर SC/ST Act और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगे; केस ने मेडिकल कॉलेजों में जातिगत भेदभाव को लेकर देशभर में बहस छेड़ दी।
ऐसे मामले देशभर से हर साल आते रहेते है और इन मामलों को कम करना ओर जड़ से हटाना अब ज़रूरी बन गया है इस मामलो कि गंभीर ता से लेके इस कानून को लाया गया था लेकिन अब इसपे सुप्रीम कोर्ट अस्थायी रोक लगा दि हैं
आदिवासी नेता इस कानून पे क्या राय रखते हैं ये भी जानना जरूरी बन जाता है
बांसवाड़ा के सांसद राजकुमार रोत ने कभी तक कोई अपनी राय ओर बयान नहीं दिया
ओर नाही गुजरात के विधायक चैतर वसावा इस कानून को लेके कुछ बोला है
नाही झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस विषय पे कुछ बोला है
देश में आदिवासी राजनेता बहोत है लेकिन इस मुद्दे पे खुल के कोई नहीं बोल रहा है
कौइ भी नेता इस विषय पे खुल कर बोलना क्यों नहीं चाहता क्या उन्हें डर है अपने राजनीति करियर का आज बोहोत सारे आदिवासी इस मुद्दे को लेके अपने नेता को सुनना चाहते हैं ओर उनसे इस कानून को समझना चाहते हैं
UGC से आदिवासियों को क्या फायदा होगा
UGC के माध्यम से:
ST छात्रवृत्ति
छात्रावास की सुविधाएँ
शुल्क में छूट
दूर-दराज़ जंगल और गाँव से आने वाले आदिवासी छात्रों के लिए
ये शिक्षा का दरवाजा खोलता है।
विश्वविद्यालयों में ST आरक्षण
रिसर्च फैलोशिप (JRF, SRF)
शिक्षण पदों में प्रतिनिधित्व
इससे आदिवासी सिर्फ पढ़ते ही नहीं, शिक्षक और शोधकर्ता भी बन सकते हैं।
आदिवासी अध्ययन विभाग
अनुसंधान अनुदान
सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण परियोजनाएँ
इससे आदिवासी संस्कृति पढ़ी और समझी जाती है।
और आदिवासी समाज को आगे लाने में इसका बोहोत बडा रोल होगा आने वाले समय में तो जितने भी लोग इस कानून के बारे में जानकारी रखते हैं वो आदिवासी समाज को इसके बारे में सही मागदर्शन करे ओर समजाये
जब UCC(Uniform Civil Code) आया तब बहोत सारे लोग इसका समर्थन कर रहे आदिवासी समुदाय को छोड़ कर क्योंकि इस कानून से कहीं ना कहीं उनका नुकसान था जेसे
आदिवासी समाज:
अपनी परंपराएँ
अपनी रिवाज
अपनी सामुदायिक नियम
के अनुसार जीता है।
UCC आने पर:
पारंपरिक विवाह प्रणाली
सामुदायिक न्याय
अवैध या अप्रासंगिक हो सकते हैं।
भारतीय संविधान:
आदिवासियों को विशेष सुरक्षा देता है
उनके लिए अलग कानूनी व्यवस्था अनुमति देता है
UCC का “एक कानून सबके लिए” विचार
इस संवैधानिक भावना के खिलाफ जाता है।
आदिवासी सिर्फ एक “समुदाय” नहीं है,
एक अलग सभ्यता है।
UCC:
सांस्कृतिक भिन्नता को नज़रअंदाज़ करता है
आदिवासियों को मजबूरन मुख्यधारा में मिला देता है
ये केवल कानून नहीं,
पहचान मिटाने का साधन बन सकता है।
UCC महिलाओं के लिए है”
लेकिन आदिवासी समाज में:
महिलाओं की भूमिका ऐतिहासिक रूप से मजबूत रही है
संपत्ति और निर्णय में भागीदारी रही है
बिना समझे बनाया गया कानून
मौजूदा संतुलन को बिगाड़ सकता है।
जो लोग आज UGC का विरोध कर रहे उस समय भी करना था जब UCC आया क्यों कि आदिवासी समाज को आज हर कोई अपने धर्म में सामिल करना चा रहा है तो फिर उनके लिए कोई सही कानून बनता है तो उनको तकलीफ क्यों होती है जब उनको नुकसान हो ऐसे कानून आते तब तो यही लोग खुल के समर्थन में आ जाते हैं तो आदिवासी समाज ये समजे की वो अपनी हक़ की लड़ाई अकेले लड रहा है बाकी सब उसके विरोधी है


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