आदिवासी युवा दो राहों पर: शिक्षा का रास्ता या उग्रवाद की ओर बढ़ता कदम || सांसद राजकुमार रोत ते जताई चिंता

आज आदिवासी युवा ओर बोहोत सारे आदिवासी नेता अपने समाज के लिए खुलकर सामने आ रहे हैं ऐसे में हमके आज के हालात देखते हुए कुछ ज़रूरी बातें को रखा है 

आदिवासी युवा दो राहों पर: शिक्षा का रास्ता या उग्रवाद की ओर बढ़ता कदम?

आज के समय में देश के कई आदिवासी क्षेत्रों में युवा अपने समाज की स्थिति को देखकर चिंतित हैं। वे देख रहे हैं कि आज भी अनेक इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। सड़क, पानी, अस्पताल और अच्छी शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतें कई जगह अब भी सपना बनी हुई हैं।

इन परिस्थितियों को देखकर आदिवासी युवाओं के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। उनके भीतर बदलाव की इच्छा भी पैदा हो रही है। लेकिन इसी मोड़ पर उनके सामने दो अलग-अलग रास्ते दिखाई देते हैं।

आदिवासी युवा दो राहों पर: शिक्षा का रास्ता या उग्रवाद की ओर बढ़ता कदम || सांसद राजकुमार रोत ते जताई चिंता

पहला रास्ता: शिक्षा, जागरूकता और संवैधानिक संघर्ष

कई युवा यह मानते हैं कि स्थायी बदलाव केवल शिक्षा और जागरूकता से ही संभव है। वे पढ़-लिखकर प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस, शिक्षक, वकील, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता बनना चाहते हैं। उनका विश्वास है कि संविधान ने जो अधिकार दिए हैं, उन्हीं के माध्यम से अपने समाज को मजबूत किया जा सकता है।

वे संगठन, कानून और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाकर अपने “जल, जंगल और जमीन” की रक्षा करना चाहते हैं। उनका मानना है कि ग्राम सभा की अनुमति, विशेषकर पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) क्षेत्रों में, अनिवार्य है और विकास के नाम पर आदिवासी समाज की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।


दूसरा रास्ता: निराशा और उग्र विचारधारा

वहीं कुछ युवा, लगातार उपेक्षा और अन्याय की भावना से आहत होकर उग्र विचारधाराओं की ओर आकर्षित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी आवाज शांतिपूर्ण तरीकों से नहीं सुनी जा रही।

इसी संदर्भ में हाल ही में सांसद Rajkumar Roat ने लोकसभा में आदिवासी मुद्दों को लेकर महत्वपूर्ण बातें रखीं { source yt rajkumar roat official} उनके बयान के बाद कई लोगों के बीच चर्चा तेज हुई, खासकर जब कुछ लोगों ने Birsa Munda और Madvi Hidma के संदर्भ में तुलना की बात कही।

हालाँकि यह तुलना बेहद संवेदनशील और विवादास्पद है। बिरसा मुंडा स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐतिहासिक आदिवासी नायक थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया। वहीं हिड़मा एक घोषित नक्सली कमांडर है, जिस पर कई हिंसक घटनाओं के आरोप हैं।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी भी प्रकार की हिंसा समाधान नहीं हो सकती।


जल, जंगल और जमीन का सवाल

आदिवासी समाज के लिए जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं हैं — वे उनकी पहचान, संस्कृति और जीवन का आधार हैं।

आज कई क्षेत्रों में खनन और विकास परियोजनाओं को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या स्थानीय ग्राम सभाओं की सहमति ली जा रही है? क्या जो संसाधन आदिवासी क्षेत्रों से निकल रहे हैं, उनका लाभ उसी समाज तक पहुँच रहा है?

अगर विकास वास्तव में समावेशी होना है, तो आदिवासी समाज को साथ लेकर, उनकी सहमति से और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करते हुए आगे बढ़ना होगा।


सलवा जुडूम और बस्तर का अनुभव

2005 से 2011 तक छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में सलवा जुडूम अभियान चला। उस दौरान हिंसा और संघर्ष की कई घटनाएँ सामने आईं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इस संघर्ष में सुरक्षा बलों, नक्सलियों और आम नागरिकों — सभी को भारी नुकसान झेलना पड़ा।

यह इतिहास बताता है कि जब संवाद की जगह हिंसा ले लेती है, तो सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों को ही होता है।


समाधान क्या है?

यह याद रखना जरूरी है कि आदिवासी समाज इस देश का अभिन्न हिस्सा है। उनकी संस्कृति, परंपरा और इतिहास भारत की पहचान का महत्वपूर्ण आधार हैं।

हिंसा किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि सरकारें और प्रशासन आदिवासी क्षेत्रों की वास्तविक समस्याओं को गंभीरता से सुनें।

  • शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ें

  • ग्राम सभा की भूमिका मजबूत हो

  • भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई हो

  • विकास का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुँचे

यदि संवाद, विश्वास और न्याय की प्रक्रिया मजबूत होगी, तो युवा गलत दिशा में जाने से बचेंगे।


निष्कर्ष

आज आदिवासी युवा एक मोड़ पर खड़ा है। एक रास्ता शिक्षा, संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक संघर्ष का है। दूसरा रास्ता निराशा और हिंसा की ओर ले जाता है।

जरूरत इस बात की है कि उन्हें सही दिशा, अवसर और सम्मान मिले।
जब विकास में भागीदारी होगी, न्याय मिलेगा और आवाज सुनी जाएगी — तब समाज सही दिशा में आगे बढ़ेगा।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आदिवासी समाज का भविष्य किताब, कलम और संविधान के साथ जुड़े — न कि बंदूक और संघर्ष के साथ।


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