राजस्थान के आदिवासी नेता सवालों के घेरे में: विकास, राजनीति या सिर्फ बयानबाज़ी ||Rajasthan Tribal Politics

 राजस्थान की धरती पर सदियों से आदिवासी समुदाय अपनी अलग पहचान, परंपरा और संघर्ष के साथ जीवन जीता आया है। भील, मीणा, गरासिया और सहरिया जैसे समुदाय इस राज्य की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि आज के दौर में राजस्थान के आदिवासी नेता कहाँ खड़े हैं? उनकी सोच, उनका संघर्ष और उनकी राजनीति क्या आदिवासियों का विकास कर रही है या फिर वे केवल अपना ही विकास करने में लगे हुए हैं?

आज राजस्थान की राजनीति में राजकुमार रोत, किरोड़ी लाल मीणा, मन्ना लाल रावत, गणेश घोघरा जैसे बड़े आदिवासी नेता अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए हैं। इनमें से कई नेता सांसद और विधायक रह चुके हैं और कई वर्षों से राजनीति का हिस्सा रहे हैं।

राजस्थान के आदिवासी नेता सवालों के घेरे में: विकास, राजनीति या सिर्फ बयानबाज़ी ||Rajasthan Tribal Politics

फिर भी सवाल उठता है — जब प्रतिनिधित्व इतना मजबूत है, तो फिर राजस्थान के कई आदिवासी इलाकों में आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी क्यों है?

डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और उदयपुर के कई जनजातीय क्षेत्रों में आज भी शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सुविधाएँ, रोजगार के अवसर और सड़क-पानी जैसी समस्याएँ पूरी तरह हल नहीं हो पाई हैं। युवा आज भी शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर होते हैं।

आज राजस्थान पुलिस आदिवासी इलाकों में अपनी मनमानी कर रही है। इन इलाकों में सड़कें सही नहीं हैं। यहाँ तक कि आदिवासी महापुरुषों के नाम भी हटाए जा रहे हैं और उनकी मूर्तियाँ भी तोड़ी जा रही हैं। तब ये सारे नेता केवल सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालकर चुप बैठ जाते हैं। क्या ये लोग केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट करके आदिवासियों का विकास करने वाले हैं?

ऐसा ही एक मामला जोधपुर जिले के बावड़ी केलावा गाँव में सामने आया, जहाँ भील आदिवासी समुदाय से आने वाली 13 वर्षीय बालिका के साथ जातिगत मानसिकता रखने वाले लोगों द्वारा बेरहमी से मारपीट की गई। यह घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

एक नाबालिग आदिवासी बच्ची के साथ इस तरह की भयावह घटना हुए आज तीन दिन हो गए, लेकिन पुलिस प्रशासन ने अभी तक किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया है। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। ऐसे ही कई मामले आए दिन आदिवासी इलाकों में होते रहते हैं। फिर ये नेता एक पोस्ट करेंगे और चुप हो जाएंगे।

आख़िर आप इन घटनाओं को रोकने के लिए क्या कर रहे हैं? क्या आप आदिवासी समाज को इस लायक बना रहे हैं कि वह अपने अधिकारों के लिए स्वयं खड़ा हो सके? उन्हें इन सभी मुद्दों के लिए जागरूक और संगठित करना होगा, ताकि वे स्वयं अन्याय के खिलाफ लड़ सकें। ताकि कोई भी व्यक्ति यहाँ के मूल निवासी आदिवासियों पर आँख उठाने की हिम्मत न कर सके।

हम सिर्फ राजकुमार रोत पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। आज लगभग हर आदिवासी नेता की यही स्थिति है, वह चाहे किसी भी दल या विचारधारा से जुड़ा हो।

आज सभी आदिवासी नेता आपस में ही लड़ने में व्यस्त हैं, लेकिन आदिवासी समाज के लिए जो ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, उनके बारे में गंभीरता से सोच भी नहीं रहे हैं।

अभी हाल ही में बजट जारी हुआ है। उसे लेकर कांग्रेस के विधायक गणेश घोघरा ने मंत्री बाबूलाल पर कई आरोप लगाए हैं।

इन आरोपों के जवाब में मंत्री खराड़ी ने कहा कि यदि असली बाप कि ओलांद गणेश घोघरा तो। उन आरोपो को साबित करके दिखाएँ।

कहीं न कहीं गणेश घोघरा की बात भी सही लगती है। यदि बजट आदिवासियों के लिए है, तो उस बजट का उपयोग भी आदिवासियों के विकास में ही होना चाहिए। आदिवासी बजट का इस्तेमाल अन्य लोगों के लिए या किसी के निजी लाभ के लिए नहीं किया जा सकता। अब आगे देखना होगा कि ये आरोप साबित होते हैं या नहीं।

आजकल आदिवासी क्षेत्र में एक पोस्टर काफी वायरल हो रहा है, जिस पर राजकुमार रोत ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जो संगठन पहले ‘भील प्रदेश’ की कविता पर आपत्ति जताते थे, वही आज आदिवासी बच्चों के हॉस्टल में जाकर अपने सम्मेलन कर रहे हैं।

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उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या ऐसे सम्मेलनों से आदिवासी बच्चे आईएएस या आईपीएस बन जाएंगे? क्या इस तरह के कार्यक्रमों से वास्तव में उनका शैक्षणिक और सामाजिक विकास होगा?

राजकुमार रोत ने यह भी प्रश्न उठाया है कि क्या यह आदिवासी संस्कृति और उनकी मूल पहचान के साथ खिलवाड़ नहीं है? उनके अनुसार, आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और बुनियादी विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि ऐसे आयोजनों को।

इस इलाके में भारत आदिवासी पार्टी सबसे अधिक प्रभावशाली नजर आती है और आदिवासी समाज का बड़ा हिस्सा इस पार्टी पर भरोसा करता है। लेकिन उन्हें भी यह बात समझनी होगी कि इस क्षेत्र में आदिवासियों के साथ जो भी घटनाएँ हो रही हैं, उन्हें रोकना उनकी ही जिम्मेदारी है, न कि केवल आकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देना।

जब जमीन पर ठोस कार्रवाई होगी, तभी आदिवासी समाज की स्थिति में वास्तविक सुधार दिखाई देगा और इस इलाके में आपसी विश्वास और मजबूती का माहौल बनेगा।

आज के समय में कहीं न कहीं गणेश घोघरा जो कार्य कर रहे हैं और जिन मुद्दों पर सवाल उठा रहे हैं, वे भी सही नजर आते हैं।

क्योंकि केवल ‘भील प्रदेश’ बनाना ही एकमात्र मुद्दा नहीं होना चाहिए। इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि आदिवासी बच्चों की शिक्षा और रोजगार के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। ‘भील प्रदेश’ की मांग हर आदिवासी की भावना से जुड़ी हो सकती है और समय के साथ उस पर निर्णय भी हो सकता है, लेकिन इस विषय पर केवल राजनीति करना आदिवासी समाज नहीं चाहता।

उम्मीद है कि आने वाले समय में राजकुमार रोत और भारत आदिवासी पार्टी इन जमीनी मुद्दों पर गंभीरता से काम करेगी और आदिवासी समाज की उम्मीदों पर खरा उतरेगी।

आज जिन जमीनी मुद्दों की आवश्यकता है, उन पर काम करना अधिक जरूरी है। शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और सम्मान जैसे विषयों पर ठोस पहल होनी चाहिए और आदिवासी समाज के साथ मजबूती से खड़े रहना चाहिए।

राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में एक और बड़े नेता का नाम किरोड़ी लाल मीणा है। आने वाले समय में उनके विषय में

 भी विस्तार से चर्चा की जाएगी।



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